Review
भाषा पर तो विनोद कुमार शुक्ल का अपने ढंग का अधिकार है ही-प्रेमचंद और जैनेंद्र के बाद इतनी सादा, रोज़मर्रा भाषा में शायद ही किसी और में अभिव्यक्ति की ऐसी क्षमता हो– लेकिन इस उपन्यास में उन्होंने संभाषण की कई भाषाएँ और शैलियाँ ईजाद की हैं–एक वह जिसमें रघुवर प्रसाद लोगों से बोलते हैं, दूसरी वह जिसमें वे ख़ुद से बोलते हैं, तीसरी वह जिसमें रघुवर प्रसाद और सोनसी अपने एकांत में बोलते हैं और चौथी वह जिसमें रघुवर प्रसाद परिवार आपस में बात करता है जिसमें हल्की-सी आंचलिकता मिली हुई है, और पाँचवीं वह जिसमें विभागाध्यक्ष और पाचार्य बोलते हैं–सबसे ‘ठेठ’ वही है। एक और अद्भुत भाषा वह है जिसमें बोलने वाला और सुननेवाला बारी-बारी कहते कुछ हैं और सुनते कुछ और हैं और यह एक और ही अर्थबाहुल्य स्निग्धता को जन्म देता है।-विष्णु खरे
About the Author
विनोद कुमार शुक्ल (जन्म : 1937) भारतीय-हिंदी साहित्य के एक अत्यंत समादृत हस्ताक्षर हैं। उन्होंने कविता और कथा में स्वयं को बरतते हुए एक ऐसी अभूतपूर्व भाषा संभव की जिसमें अचरज, सुख और सरोकार साथ-साथ चलते हैं—पठनीयता को बाधित किए बग़ैर। उनके नौ कविता-संग्रह, चार कहानी-संग्रह, छह उपन्यास प्रकाशित हैं। संसार की लगभग सभी बड़ी भाषाओं में उनकी रचनाएँ अनूदित हो चुकी हैं। वे रंगमंच और सिनेमा में उतरकर प्रशंसित-पुरस्कृत हो चुकी हैं। ‘गजानन माधव मुक्तिबोध फ़ेलोशिप’, ‘राष्ट्रीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’, ‘शिखर सम्मान’ (म.प्र. शासन), ‘हिंदी गौरव सम्मान’ (उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान), ‘रज़ा पुरस्कार’, ‘दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान’, ‘रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार’ तथा ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के लिए ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ प्राप्त विनोद कुमार शुक्ल को अंतरराष्ट्रीय साहित्य में उपलब्धि के लिए वर्ष 2023 के प्रतिष्ठित पेन/नाबोकोव पुरस्कार (PEN/Nabokov Award) से सम्मानित किया गया है।
vishakha –
“दीवार में एक खिड़की रहती थी” विनोद कुमार शुक्ल का एक प्रसिद्ध उपन्यास है जिसे 1999 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था